आज हवाओं में अजब नशा सा है [ग़ज़ल - होली विशेष]

दिल गुलाबी , जिस्म सतरंगा सा है
आज हवाओं में अजब नशा सा है 

जवान आरिज़ में और सुर्खियाँ भर दें
बैचैन हाथों में सुर्ख रंग लगा सा है 

धीरे - धीरे छा रही होली की बयार
कोई खुश है तो कोई डरा सा है 

ज़मीं कहती है प्यार से भिगो दो आसमान 
मोहब्बतों से खुद आसमान भरा सा है

तुम मुझे चाह के भी छोड़ नहीं पाओगे 
रिश्ता अपना ऐसी डोर से बंधा सा है

होली के साथ फेरे ले लिए सात हमने
ज़माना बनके गवाह चुपचाप खड़ा सा है 

कहीं मस्ती , कही हुल्लड़, कहीं ठिठोली देखो
रंगों के रंग में मेरा वतन रंगा सा है

वो मुझे चूम ले और रंग बिरंगा कर दे
ख्वाब "दीपक" निगाहों में एक हरा सा है
                    - दीपक शर्मा

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